Tuesday, February 15, 2011

अब भी समाधान से दूर नेपाल


जनवरी 2007 में माओवादियों ने जब 10 वर्षों की अराजकता के बाद कुछ लोकतंत्र समर्थकों के साथ मिलकर नेपाल की राजशाही को खत्म कर वहां लोकतंत्र की स्थापना में सफलता पाई थी, तो इसे नई सुबह के रूप में देखा गया था। पर लगता है कि नेपाल अब तक सुबह से पहले के कुहासे को चीरकर बाहर नहीं आ पाया है। सवाल उठता है कि क्या नेपाल की तंग राजनीति लोकतंत्र को गंतव्य तक पहुंचने देगी।
लंबी राजनीतिक उठा-पटक के बाद जब नेपाली संसद ने झलनाथ खनाल को प्रधानमंत्री चुना, तो त्वरित प्रतिक्रिया आई कि अब पिछले सात महीनों से जारी राजनीतिक संकट समाप्त हो जाएगा। लेकिन लगता है यह आकलन गलत सिद्ध होगा। क्योंकि माओवादी नेता ने जो देश के लिए तथाकथित त्याग किया था, वह दरअसल त्याग नहीं, बल्कि परदे के पीछे की गई एक सौदेबाजी थी। इसका अभी तक पूरी तरह से खुलासा तो नहीं हो पाया है, पर खबर है कि खनाल-प्रचंड सौदेबाजी के मुताबिक, खनाल 24 मई को अपना पद प्रचंड के लिए छोड़ देंगे। नेपाल के एक वित्तीय अखबार आर्थिक अभियान की रिपोर्ट में कहा गया है कि खनाल और माओवादी प्रमुख प्रचंड, दोनों इस बात को महसूस करते हैं कि वे 28 मई तक नया संविधान तैयार नहीं कर पाएंगे। लिहाजा खनाल 24 मई को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे और उसके बाद कम्युनिस्टों के समर्थन से प्रचंड नए प्रधानमंत्री बनाए जाएंगे।
अखबार की इस खबर पर भरोसा करें, तो कहना गलत न होगा कि खनाल माओवादियों के सत्ता तक पहुंचने का साधन हैं। सात महीनों तक चली उठा-पटक से साबित हो गया कि माओवादी सीधे रास्ते सत्ता तक नहीं पहुंच पाएंगे। इसलिए प्रचंड ने यह रास्ता खोज निकाला। इस रिपोर्ट के अनुसार खनाल ने अपनी ही पार्टी को अंधेरे में रखकर माओवादियों के साथ सात सूत्री समझौता किया। स्थायी समिति की बैठक में खनाल ने स्वीकार भी किया कि सत्ता की साझेदारी और पूर्व लड़ाकों के सेना में एकीकरण समेत प्रमुख मुद्दों पर उनका प्रचंड से गुप्त समझौता हुआ है। मतलब यह समझौता देश की चुनौतियों से निपटने के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हुआ है। लेकिन क्या यह उद्देश्य पूरा हो पाएगा?
इस सौदेबाजी के बाद भी खनाल को कैबिनेट चुनने में छीकें आ गईं, क्योंकि दोनों दल सत्ता बंटवारे को लेकर किसी समझौते पर पहुंचने में विफल रहे। सूत्रों के मुताबिक, खनाल की पार्टी पूर्व विद्रोहियों को गृह तथा रक्षा विभाग देने को राजी नहीं थी। नतीजतन माओवादियों ने सरकार में शामिल होने से ही इनकार कर दिया। हालांकि माओवादी नेता ने यह आश्वासन दिया कि वह नई सरकार को बाहर से समर्थन देते रहेंगे। लेकिन कब तक?
खनाल सरकार के समक्ष दो अहम चुनौतियां हैं। पहला, 28 मई तक संविधान को पूरा करना और दूसरा, मध्य फरवरी तक संसद से चालू वित्त वर्ष के बजट का अनुमोदन कराना। यदि सरकार बजट का अनुमोदन कराने में विफल रही, तो देश वित्तीय संकट में फंस जाएगा। लेकिन इससे भी गंभीर बात है, नेपाल की आधारभूत जटिल स्थिति। उल्लेखनीय है कि माओवादी आंदोलन ने नेपालियों को गरीबी में धकेलने में खासी मदद की। आज लगभग एक करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, 70 प्रतिशत आबादी निरक्षर है, 1.8 करोड़ लोगों के पास बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं और 24.4 प्रतिशत परिवार भूमिहीन हैं। वहां बाल मजूदरों की संख्या 26 लाख के आसपास है और लगभग दो लाख से भी ज्यादा महिलाएं वेश्यावृत्ति के लिए विवश हैं। औद्योगिक विकास न के बराबर है और 81 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। अधिकांश नेपाली रोजगार की तलाश में भारत और खाड़ी देशों सहित पूर्वी एशिया का चक्कर काटते हैं। इनसे निपटने के लिए राजनीतिक दलों के पास न तो कोई आर्थिक मॉडल है और न ही इच्छाशक्ति।
फिलहाल खनाल पूरी तरह से माओवादी सांसदों पर आश्रित हैं, इसलिए उनसे जनता के भले की उम्मीद करना बेमानी होगा। पर क्या नेपाली नेताओं को दुनिया के जन उभार दिखाई नहीं देते। इससे पहले कि जनता में रोष उत्पन्न हो, वहां के राजनेताओं को अपनी आंखें खोल लेनी चाहिए। भारत को भी इन गतिविधियों पर नजर रखनी होगी, क्योंकि माओवादी चीन को नेपाल में सक्रिय करने के लिए इसका फायदा उठाना चाहेंगे, ताकि भारत को काउंटर बैलेंस किया जा सके।

बंजर जमीन पर हल्की फुहार


विदेश सचिवों की बैठक से भारत-पाक संबंधों में सुधार की नई राह बनती देख रहे हैं कुलदीप नैयर
बंजर संबंधों में एक हल्की-सी फुहार भी जान फूंक देती है। भारत और पाकिस्तान छह दशक से दूरस्थ पड़ोसी हैं। दोनों के बीच संबंधों में जमी बर्फ कुछ पिघली है। दोनों देशों के विदेश सचिव मिले और हताश होकर नहीं बिछड़े, यह भी अपने आप में एक खबर है। वार्ता के बाद संतुष्टि एक बड़ी उपलब्धि है। भारत की विदेश सचिव निरूपमा राव ने कहा है कि उन्होंने उन सभी अनिर्णीत समस्याओं पर विचार-विमर्श किया जो दोनों देशों के समक्ष मौजूद हैं। पाकिस्तान के सलमान बशीर ने स्वीकार किया कि दिलों का मिलन हुआ है। यह एक सकारात्मक घटनाक्रम है। इससे तात्पर्य यह है कि दिल्ली में शीघ्र ही दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक होगी। मुझे विश्वास है कि वार्ता क्रम आगे बढ़ेगा। आगे बढ़ने के लिए पथ प्रशस्त है। बैठक से पूर्व पाकिस्तान ने कहा कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट में हिंदू आतंकवादियों के मामले में भारत पर्याप्त पहल नहीं कर रहा है। यह नई दिल्ली द्वारा इस बात पर खेद व्यक्त किए जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप कहा गया कि 26/11 के मुंबई हमले के बारे में समुचित प्रगति नहीं हुई और लश्करे-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद द्वारा दी गई इस धमकी के मामले में भी कि भारत या तो कश्मीर को छोड़ दे अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहे। इस पृष्ठभूमि में गतिरोध के बारे में मेरी आशंकाएं निराधार नहीं थीं। सलमान बशीर थोड़ा बदले हैं। उन्होंने कहा कि आतंकवादियों का किसी खास संप्रदाय से संबंध नहीं। नई दिल्ली को भी देर से ही सही अहसास हुआ कि भगवा आतंकवाद भी देश में आतंकवाद का हिस्सा है। इससे पूर्व यह तर्क दिया जाता था कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, परंतु सभी आतंकवादी मुस्लिम हैं, मगर सईद के युद्ध आ ान को चुनौती नहीं मिली है। इस्लामाबाद अपनी इसी बात पर अड़ा है कि सईद की 26/11 के मुंबई हमले में संबद्धता का कोई साक्ष्य नहीं मिला है, किंतु इससे भारत के विरुद्ध सईद की उन्मादी घोषणाओं पर जो वह समय-समय पर करता रहता है, इस्लामाबाद के मौन का औचित्य सिद्ध नहीं हो जाता। मैं मानता हूं कि यदि दोनों पक्षों का एक-दूसरे पर भरोसा हो तो वे अलंकारिक उद्घोषों को लंबे डग भरने से अधिक कुछ नहीं मानेंगे। फिर भी यह तथ्य सही है कि नई दिल्ली सईद के विरुद्ध कार्रवाई को विश्वास में कमी लाने के लिए एक कसौटी मानता है। जब हैदराबाद (भारत) में आयोजित एक सम्मेलन में पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी यह कहते हैं कि सरकार में ऐसी ताकतों से भिड़ने के लिए साहस की कमी है, जो कानून का उल्लंघन करती है तो वह आसिफ अली जरदारी सरकार को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। संभवत: सईद का मामला इसी श्रेणी में आता है। अंततोगत्वा पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष की सोच ही चलेगी। जनरल परवेज कयानी के बारे में विवादास्पद और परस्पर विरोधी बातें सुनने को मिल रही हैं। विकिलीक्स का कहना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बीच समझौता हस्ताक्षर के लिए तैयार था, किंतु जनरल कयानी ने आपत्ति जता दी। दूसरी ओर थिंपू में पाकिस्तान के विदेश सचिव ने कहा है कि सेना उस बातचीत का पूरी तरह समर्थन करती है जो उन्होंने निरूपमा राव के साथ शुरू की है। इससे पूर्व जनरल कयानी ने कश्मीर पर सख्त रवैये का संकेत दिया था। उन्होंने यह दोहराया है कि भारत के साथ संबंध कश्मीर के समाधान पर निर्भर हैं। इस बीच दोनों ओर के लोग कश्मीर पर बैक चैनल के माध्यम से समझौते के बारे में जानना चाहेंगे। जब दोनों सरकारें यह कहती हैं कि 80 प्रतिशत समाधान हो चुका है तो उससे ऐसा आभास होता है कि सुझावों पर दोनों पक्ष एकमत हैं। दोनों ओर के लोगों को अब तक हुई प्रगति की जानकारी होनी ही चाहिए। अंततोगत्वा वे ही तो महत्वपूर्ण हैं। परिदृश्य के पीछे वार्ता एक बिंदु तक होना ही सही है, परंतु एक लोकतांत्रिक ढांचे में लोग ही तो शासक हैं और उन्हें सुनिश्चित तौर पर समझौते का ब्यौरा पता होना ही चाहिए। दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों के बीच जो समस्या व्यवधान सा उपस्थित करती है वह यह है कि इस्लामाबाद ने सारे अंडे कश्मीर की टोकरी में ही रख दिए है। जब तक उसका समाधान उसके संतोष के अनुरूप नहीं हो जाता तब तक व्यापार और व्यक्ति से व्यक्ति संबंधों में सुगमता के लिए वीजा में सरलता की दृष्टि से कोई प्रगति नहीं हो सकती। ़मेरा विश्वास है कि इन दो मुद्दों के क्रियान्वयन से दोनों देशों के लोगों में निकटता बढ़ सकती है और एक-दूसरे के विरुद्ध अविश्वास के पर्दे हट सकते हैं। मेरे विचार में निरूपमा राव ने व्यापार की फिर से बहाली का प्रस्ताव किया होगा। इससे एक से दूसरे देश में समृद्धि के लिहाज से निहित स्वार्थ सृजित होंगे। मैं यह भी कामना करता हूं कि उन्होंने सर क्रीक और सियाचिन ग्लेशियर पर दो समझौतों पर हस्ताक्षर की पेशकश की ही होगी। एक समय पर जुल्फिकार अली भुट्टो ने कदम-दर कदम उस राह का समर्थन किया था जो भारत अपनाने को था, किंतु अब तीन दशकों का विलंब हो चुका है। तब वह समग्र समाधान चाहते थे, जिसके पाकिस्तान अब पक्ष में है। वार्ता और विचार-विमर्श से ही मतभेद पाटे जा सकते हैं। निरूपमा राव ने चेताया है कि अगले कुछ माह के लिए चीजें शिथिल रहने वाली नहीं हैं। खासी सक्रियता रहेगी। उससे इस जानकारी की पुष्टि होती है कि दोनों देशों के गृह सचिव विदेश मंत्रियों की बैठक होने से पूर्व मिलेंगे। निरूपमा राव ने कहा है कि प्रक्रिया शुरू करने की इच्छा है। दोनों पक्ष शिष्टाचार की विधि के सिद्धांत के अनुसार कार्य करने पर सहमत हो गए। कानूनी शिष्टाचार पारस्परिक संबंधों का नया द्वार खोलता है। इससे तात्पर्य यह है कि अदालतें इस ढंग से काम न करें जिससे दूसरे देश के क्षेत्राधिकार, कानूनों अथवा न्यायिक निर्णयों पर किसी भी तरह से बुरा प्रभाव नहीं पड़े। मात्र सरकार के स्तर पर ही बात का क्रम न चले, बल्कि बौद्धिक वर्ग, व्यापारी, विधिज्ञ, डाक्टर, पत्रकार और सिविल सोसाइटी के अन्य सदस्यों के स्तर पर भी ऐसा होना अत्यावश्यक है। दोनों पक्षों को एक लंबे प्रयास के लिए तैयार होना चाहिए। उतार-चढ़ाव को झेलने की सिद्धता भी चाहिए। उन लोगों द्वारा आघात लगाने के प्रयास होंगे जो मैत्रीपूर्ण संबंध नहीं चाहते। उन कट्टरपंथियों की ओर से भी धमकियां मिलेंगी जो प्रयासों को सांप्रदायिक रंग देना चाहेंगे। इनका मुकाबला करने के लिए दोनों देशों को संबंधों को सामान्य बनाने की प्रतिबद्धता और संकल्प दर्शाना होगा। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)

बांग्लादेश की बढ़ती ताकत


बांग्लादेश के सैन्य आधुनिकीकरण पर महेंद वेद की टिप्पणी
बांग्लादेश अपनी नौसेना और वायुसेना शक्ति को बढ़ाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2019 तक बांग्लादेश नौसेना के पास बेस सुविधाओं वाली अपनी पहली पनडुब्बी होगी। बांग्लादेश वायुसेना के लिए कोक्स बाजार में अड्डा बनाया जा रहा है, जिससे समुद्री सीमाओं तथा अन्य सैन्य और नागरिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। बांग्लादेश अत्याधुनिक युद्धक विमान और मिसाइलें हासिल करने का भी प्रयास कर रहा है। शेख हसीना ने 1970 के दशक में अपने पिता और देश के संस्थापक नेता शेख मुजीबुर रहमान का एक बयान उद्धृत करते हुए कहा-बांग्लादेश किसी के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन किसी ने बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश की तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बांग्लादेश अपनी नौसेना को एक आधुनिक और सुसज्जित सेना के रूप में विकसित करने का प्रयास कर रहा है, ताकि उसकी समुद्री सीमा में विदेशी जहाजों के अवैध प्रवेश और तस्करी को रोका जा सके। यह इसलिए और भी जरूरी हो जाता है क्योंकि बांग्लादेश का विशाल समुद्री क्षेत्र उसके राष्ट्रीय अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण अंग है। बांग्लादेश का करीब 90 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय व्यापार समुद्री मार्गों से होता है। शेख हसीना पड़ोसी देशों के साथ समुद्री सीमा विवाद को सुलझाने का प्रयास भी कर रही हैं। हालांकि बांग्लादेश, भारत तथा म्यांमार के बीच समुद्र में तनातनी हुई है, लेकिन हसीना सरकार विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने का प्रयास कर रही है। समुद्री सीमा पर विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब म्यांमार ने पिछले साल बंगाल की खाड़ी में गहरे समुद्र में खनिज संसाधनों की खोज शुरू की। भारत ने भी बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश द्वारा जताए गए दावों वाले संसाधनों पर अपना दावा जताया है, जिससे दोनों देशों के बीच विवाद खड़ा हो गया। अक्टूबर 2009 में बांग्लादेश ने म्यांमार और भारत के साथ अपने समुद्री सीमा विवादों पर संयुक्त राष्ट्र से मध्यस्थता करने को कहा। उसका कहना था कि पड़ोसियों से इस मुद्दे को जल्दी नहीं निपटाया जा सकता। तीनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून पंचाट के सामने अपना-अपना पक्ष रखा है। जब तक फैसला नहीं आता तब तक तीनों देशों ने बातचीत जारी रखने का फैसला किया है। विवाद के समाधान से तीनों देशों को बंगाल की खाड़ी में हाइड्रोकार्बन की खोज में मदद मिलेगी। समुद्री सीमा समझौते से भारत, बांग्लादेश और म्यांमार को संभावित भंडारों की खोज शुरू करने में आसानी होगी। भारत ने बंगाल की खाड़ी के निचले हिस्सों में कुछ प्रगति की है। समझौता हो जाने से बांग्लादेश का गैस संकट कम करने और म्यांमार के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में मदद मिल सकेगी। म्यांमार के नए सीमांकित समुद्री क्षेत्र में गैस मिलने से चीन और भारत के बीच उसी प्रकार की प्रतिस्पद्र्धा शुरू हो जाने की आशा है, जैसी कि श्वे में गैस मिलने से हुई थी। दोहरे दावे वाले इलाकों में गैस मिलने से म्यांमार को भारत के साथ मजबूत आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक संबंध कायम करने का अवसर मिलेगा। बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में सहयोग के लिए क्षेत्रीय बहुराष्ट्रीय संगठनों, खास तौर से बीआईएमएसटीईसी में संभावनाएं मौजूद हैं। अगर संयुक्त राष्ट्र पंचाट का फैसला आ जाता है तो समुद्री सीमा विवादों को सुलझाने में मदद मिलेगी। तीनों देशों के लिए तो यह जीत की स्थिति होगी। शेख हसीना भारत, नेपाल और भूटान जैसे अन्य दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों की ओर सहयोग का हाथ बढ़ा रही हैं। हसीना ने कहा है कि उनकी सरकार ने आर्थिक, राजनीतिक और राजनयिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए चटगांव और मोंगला बंदरगाहों को पड़ोसी देशों के लिए खोलने का फैसला पहले ही कर लिया है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Thursday, February 10, 2011

बिना वीजा कर सकेंगे सार्क देशों की यात्रा


पूर्वोत्तर में शांति की किरण


यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) और भारत सरकार के बीच 10 फरवरी से शुरू होने वाली बिना शर्त बातचीत का श्रेय बांग्लादेश को दिया जाना चाहिए। शेख हसीना ने बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बनते ही कहा था कि वह अपने देश की धरती से भारत विरोधी गतिविधियां चलाने की इजाजत किसी उग्रवादी गुट को नहीं देंगी। हसीना ने जो कहा, उसे करके दिखाया और स्वयं को भारत का वास्तविक मित्र साबित किया। वैसे, उल्फा द्वारा भारत सरकार के साथ बिना शर्त वार्ता शुरू करने को सशस्त्र आंदोलन छोड़ने के विवेक के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उल्फा ने पांच फरवरी को कहा कि दस फरवरी को शुरू हो रही बातचीत में असम की संप्रभुता को शामिल करने की शर्त वह नहीं रख रहा है। यह बयान इसलिए सार्थक है क्योंकि स्वाधीनता के तुरंत बाद ही पूर्वोत्तर के उग्रवाद से भारत की संप्रभुता को चुनौती मिलने लगी थी। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि भारत की विविधता, विशालता और बहुलता से सामंजस्य नहीं बिठा पाने के कारण ही पूर्वोत्तर में संप्रभुता की मांग ने जोर पकड़ा था। असम की संप्रभुता की मांग को हासिल करने के लिए ही परेश बरुआ ने 1979 में उल्फा की स्थापना की थी। उल्फा ने भारत के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर रखी थी। उल्फा ने लंबे समय तक आल त्रिपुरा टाइगर्स फोर्स (एटीटीएफ), मणिपुर पीपल्स लिबरेशन फ्रंट (एमपीएलएफ), यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) और रिवोल्यूशनरी पीपल्स फ्रंट (आरपीएफ) के साथ मिलकर असम, त्रिपुरा और मणिपुर में ऑपरेशन फ्रीडम चलाया। तथ्य यह भी है कि असम समेत पूरे पूर्वोत्तर में उग्रवादियों की हिंसा का सामना करने के लिए सरकार स्वयं हिंसा का सहारा लेती रही है। अकेले असम में उल्फा व सुरक्षा बलों के बीच हुए हिंसक संघषरें में अब तक दस हजार लोग मारे गए हैं। ये मौतें रोकी जा सकती थीं। क्या यह सच नहीं कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व के पास कोई दूरगामी कार्यनीति नहीं होने के कारण ही पूर्वोत्तर में उग्रवाद फलता-फूलता गया और शासन के हाथ से हालात निकलते चले गए? इसलिए उल्फा से वार्ता शुरू करने के अवसर का उपयोग भारत सरकार को ऐसी दूरगामी रणनीति बनाने में करना चाहिए जो समूचे पूर्वोत्तर के उग्रवाद व असंतोष को दूर करने में सहायक हो। सरकारी वार्ताकारों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि संवेदनशील सोच नहीं रखने के कारण ही शासन आज तक पूर्वोत्तर के उग्रवाद की समस्या का हल नहीं ढूंढ़ पाया है। सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि पूर्वोत्तर में विकास न होने और रोजगार के अवसरों की कमी के कारण ही वहां नौजवानों में असंतोष बढ़ता रहा है। सरकार को पूर्वोत्तर के लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर कार्यनीति बनानी होगी। स्थानीय योजनाएं बनाकर खेती, कुटीर उद्योग के साधन मुहैया कराए जाने चाहिए, प्रकृति से छेड़छाड़ बंद होनी चाहिए और पूर्वोत्तर की जनजातियों की भाषाओं को मान्यता दी जानी चाहिए। आखिर आज तक पूर्वोत्तर की भाषाओं के आत्म गौरव व पहचान को सरकारी स्तर पर स्वीकृति क्यों नहीं दी गई है? मेघालय की खासी और गारो, अरुणाचल की निशी, त्रिपुरा की काकबराक, चकमा और मणिपुर की मीतै जैसी समृद्ध भाषाओं को पूर्वोत्तर में शिक्षा का माध्यम क्यों नहीं बनाया गया? इन भाषाओं के साहित्य को हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में लाने की दिशा में सरकारी संस्थाओं ने क्यों रुचि नहीं दिखाई? पूर्वोत्तर की एक अन्य समृद्ध भाषा है-बोडो। बोडोभाषियों ने सत्तर के दशक में अलग बोडोलैंड की मांग को लेकर जोरदार आंदोलन किया था जिसमें सैकड़ों युवक हताहत हुए थे, हजारों को जेल हुई थी और अंतत: बोडो भाषा को सरकारी मान्यता मिलने व बोडो स्वायत्त परिषद बनने के बाद ही वह आंदोलन वापस हुआ था। दस फरवरी की वार्ता में हिस्सा ले रहे भारत सरकार के प्रतिनिधियों को यह भी देखना चाहिए कि पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को लागू करने की नीति क्या सम्यक रही है? सुरक्षा के लिए इस कानून को लागू किया गया है पर इस कानून ने वहां की जनता को और ज्यादा असुरक्षित, लाचार व भयभीत बनाया है। इस कानून को वापस लेने की मांग को लेकर मणिपुर की इरोम शर्मिला सत्याग्रह के रास्ते को अपनाते हुए नवंबर 2000 से अनशन कर रही हैं। सरकार इस तरह के अहिंसक आंदोलनों के प्रति भी असहिष्णुता क्यों दिखा रही है? इरोम ने अपनी एक कविता में लिखा है-मैं तो शांति की सुगंध फैलाऊंगी/ अपने जन्मस्थल खाग्लेई से/ आने वाले युगों में/ यह सारी दुनिया में फैल जाएगी। उल्फा पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा उग्रवादी गुट रहा है। उसके रुख में बदलाव का असर पूरे पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों पर पड़ेगा। निश्चित ही यह एक शुभ संकेत है। उल्फा के रूपांतरण के बाद अब भारत सरकार की बारी है। सरकार को अपनी मौजूदा नीतियों को टटोलना चाहिए और उग्रवादियों की मांगों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Wednesday, February 9, 2011

बातचीत के उलझे समीकरण

रविवार को भूटान की राजधानी थिंपू में भारत-पाक सचिव वार्ता का नतीजा मिला-जुला रहा। अच्छी-बुरी दोनों तरह की खबरें मिली हैं। बुरी खबर यह है कि भारत की विदेश सचिव निरुपमा राव और उनके पाक समकक्ष सलमान बशीर पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के भारत दौरे की तिथि भी तय नहीं कर पाए। माना जा रहा है कि कुरैशी 2011 की पहली तिमाही के अंत तक भारत यात्रा पर आएंगे। थिंपू वार्ता में कुरैशी की भारत यात्रा की तिथियां निर्धारित करने का अच्छा मौका था, जो दोनों विदेश सचिवों ने गंवा दिया। इससे संकेत मिलता है कि दोनों पक्षों में अहम मुद्दों पर मूलभूत मतभेद हैं। एक और बुरी खबर यह है कि दोनों देशों के विदेश सचिव व्यापार, सर क्रीक जैसे कम महत्व के मुद्दों पर व्यापक कार्ययोजना तैयार नहीं कर पाए हैं, जबकि इस वार्ता में इसकी उम्मीद की जा रही थी। उनसे इस बात पर सहमति की भी उम्मीद जताई जा रही थी कि आतंकवाद के मुद्दे पर गृह सचिवों की पृथक वार्ता के अलावा वाणिज्य, संस्कृति और जल संसाधन के मसले पर अलग से वार्ताओं की रूपरेखा तैयार की जाएगी। अच्छी खबर यह है कि दोनों विदेश सचिवों ने परिपक्वता का परिचय देते हुए पृथक प्रेस वार्ताओं में काफी संयमित व्यवहार किया। राव-बशीर वार्ता से प्रवाहित उत्साहव‌र्द्धक कूटनीतिक प्रतीकात्मकता में जटिल मसलों पर आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तमाम मुद्दों पर समान सुर में बात की गई। राव ने मुंबई आतंकी हमलों की जांच में पाकिस्तान की ढिलाई संबंधी सवालों का संयमित जवाब दिया। इसी तरह बशीर ने पाकिस्तान जा रही समझौता एक्सप्रेस में 17 फरवरी, 2007 को पानीपत के पास हुए विस्फोट के मुद्दे पर भारत की भूमिका पर कीचड़ उछालने से परहेज किया। इस विस्फोट में 68 लोग मारे गए थे, जिनमें 42 पाकिस्तानी थे। यह एक अच्छा संकेत है। यह तीन बार सीधा युद्ध लड़ चुके दो परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसियों के संबंधों के सामान्यीकरण की दिशा में पहलकदमी है। दोनों पक्षों को बातचीत जारी रखने और मीडिया के माध्यम से मोलभाव की प्रवृत्ति पर अंकुश रखने की आवश्यकता है। अटल बिहारी वाजपेयी और परवेज मुशर्रफ के बीच आगरा शिखर सम्मेलन की विफलता इसका जीता-जागता प्रमाण है कि भारत और पाकिस्तान को किस प्रकार द्विपक्षीय संबंधों में आचरण नहीं करना चाहिए। भारत और पाकिस्तान के इतना करीब होते हुए भी इतना दूर होने के कारणों में द्विपक्षीय वार्ताओं में प्रदर्शित नजरिये में मूल अंतर भी शामिल है। पाकिस्तान की नीति शिखर से सतह की ओर जाने की है। यानी वह सबसे पहले कश्मीर के मुद्दे को हल करना चाहता है और बाद में अन्य मुद्दों को। भारत की नीति सतह से शीर्ष है। भारत इस बात पर जोर देता है कि पहले पाकिस्तान सर क्रीक, व्यापार और व्यक्ति का व्यक्ति से संपर्क जैसे मुद्दों को पहले सुलझाए और बाद में जटिल मुद्दों का हल निकालने का प्रयास करे। इसी कारण अनेक अवसरों पर द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत और पाकिस्तान अलग-अलग धरातल पर खड़े नजर आते हैं। यह अजीब लगता है, किंतु है बिल्कुल सच कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सबसे अधिक प्रगति जनरल परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में हुई, जो कारगिल युद्ध के प्रमुख सूत्रधार थे। उनके शासनकाल में ही भारत और पाकिस्तान महत्वपूर्ण विश्वास निर्माण उपायों (सीबीएम) पर राजी हुए थे। दोनों देशों के बीच श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस सेवा की शुरुआत या फिर आतंक विरोधी तंत्र की स्थापना हुई, जिसके तहत दोनों पक्षों की खुफिया एजेंसियों की वार्ताओं आयोजित की गईं। ये प्रयास बाद में विफल हो गए थे। मुशर्रफ के कार्यकाल में सीबीएम में सबसे महत्वपूर्ण कदम दोनों देशों की सीमाओं पर सीज फायर संबंधी था। कुछ छोटे-मोटे उल्लंघनों को छोड़कर यह सीबीएम छह साल के बाद अब तक भी जारी है। यही नहीं, नियंत्रण रेखा पर आने-जाने के छह मार्ग भी मुशर्रफ के शासनकाल में ही खुले थे। यह प्रगति इस तथ्य के बावजूद हुई कि अपने पूरे कार्यकाल के दौरान मुशर्रफ कश्मीर के मुद्दे पर जरा भी शिथिल नहीं पड़े। पाकिस्तान कभी भी भारत को यह नहीं बता पाया कि वह आखिर चाहता क्या है? पाकिस्तान बस कश्मीरियों की भावनाओं की कद्र करने का राग अलापता रहा है। यही नहीं, मुशर्रफ के कार्यकाल में ही भारत और पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे पर भी समझौते के करीब पहुंच गए थे, किंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका था। निकट भविष्य में भारत-पाकिस्तान विवाद हल होने की संभावना दूर की कौड़ी है। जब भी दोनों पक्ष मिलते हैं तो वे असहमति पर ही सहमत होते हैं। वे पत्तियों पर पानी छिड़कते हैं और जड़ को सूखी छोड़ देते हैं। जब तक पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान के दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन नहीं आता, भारत पाकिस्तान के बीच रिश्ते पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकते। भारत विरोधवाद पाकिस्तान के नागरिक और सैन्य प्रतिष्ठान की डीएनए संरचना है। इसे भारत नहीं बदल सकता।