विदेश सचिवों की बैठक से भारत-पाक संबंधों में सुधार की नई राह बनती देख रहे हैं कुलदीप नैयर
बंजर संबंधों में एक हल्की-सी फुहार भी जान फूंक देती है। भारत और पाकिस्तान छह दशक से दूरस्थ पड़ोसी हैं। दोनों के बीच संबंधों में जमी बर्फ कुछ पिघली है। दोनों देशों के विदेश सचिव मिले और हताश होकर नहीं बिछड़े, यह भी अपने आप में एक खबर है। वार्ता के बाद संतुष्टि एक बड़ी उपलब्धि है। भारत की विदेश सचिव निरूपमा राव ने कहा है कि उन्होंने उन सभी अनिर्णीत समस्याओं पर विचार-विमर्श किया जो दोनों देशों के समक्ष मौजूद हैं। पाकिस्तान के सलमान बशीर ने स्वीकार किया कि दिलों का मिलन हुआ है। यह एक सकारात्मक घटनाक्रम है। इससे तात्पर्य यह है कि दिल्ली में शीघ्र ही दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक होगी। मुझे विश्वास है कि वार्ता क्रम आगे बढ़ेगा। आगे बढ़ने के लिए पथ प्रशस्त है। बैठक से पूर्व पाकिस्तान ने कहा कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट में हिंदू आतंकवादियों के मामले में भारत पर्याप्त पहल नहीं कर रहा है। यह नई दिल्ली द्वारा इस बात पर खेद व्यक्त किए जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप कहा गया कि 26/11 के मुंबई हमले के बारे में समुचित प्रगति नहीं हुई और लश्करे-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद द्वारा दी गई इस धमकी के मामले में भी कि भारत या तो कश्मीर को छोड़ दे अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहे। इस पृष्ठभूमि में गतिरोध के बारे में मेरी आशंकाएं निराधार नहीं थीं। सलमान बशीर थोड़ा बदले हैं। उन्होंने कहा कि आतंकवादियों का किसी खास संप्रदाय से संबंध नहीं। नई दिल्ली को भी देर से ही सही अहसास हुआ कि भगवा आतंकवाद भी देश में आतंकवाद का हिस्सा है। इससे पूर्व यह तर्क दिया जाता था कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, परंतु सभी आतंकवादी मुस्लिम हैं, मगर सईद के युद्ध आ ान को चुनौती नहीं मिली है। इस्लामाबाद अपनी इसी बात पर अड़ा है कि सईद की 26/11 के मुंबई हमले में संबद्धता का कोई साक्ष्य नहीं मिला है, किंतु इससे भारत के विरुद्ध सईद की उन्मादी घोषणाओं पर जो वह समय-समय पर करता रहता है, इस्लामाबाद के मौन का औचित्य सिद्ध नहीं हो जाता। मैं मानता हूं कि यदि दोनों पक्षों का एक-दूसरे पर भरोसा हो तो वे अलंकारिक उद्घोषों को लंबे डग भरने से अधिक कुछ नहीं मानेंगे। फिर भी यह तथ्य सही है कि नई दिल्ली सईद के विरुद्ध कार्रवाई को विश्वास में कमी लाने के लिए एक कसौटी मानता है। जब हैदराबाद (भारत) में आयोजित एक सम्मेलन में पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी यह कहते हैं कि सरकार में ऐसी ताकतों से भिड़ने के लिए साहस की कमी है, जो कानून का उल्लंघन करती है तो वह आसिफ अली जरदारी सरकार को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। संभवत: सईद का मामला इसी श्रेणी में आता है। अंततोगत्वा पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष की सोच ही चलेगी। जनरल परवेज कयानी के बारे में विवादास्पद और परस्पर विरोधी बातें सुनने को मिल रही हैं। विकिलीक्स का कहना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बीच समझौता हस्ताक्षर के लिए तैयार था, किंतु जनरल कयानी ने आपत्ति जता दी। दूसरी ओर थिंपू में पाकिस्तान के विदेश सचिव ने कहा है कि सेना उस बातचीत का पूरी तरह समर्थन करती है जो उन्होंने निरूपमा राव के साथ शुरू की है। इससे पूर्व जनरल कयानी ने कश्मीर पर सख्त रवैये का संकेत दिया था। उन्होंने यह दोहराया है कि भारत के साथ संबंध कश्मीर के समाधान पर निर्भर हैं। इस बीच दोनों ओर के लोग कश्मीर पर बैक चैनल के माध्यम से समझौते के बारे में जानना चाहेंगे। जब दोनों सरकारें यह कहती हैं कि 80 प्रतिशत समाधान हो चुका है तो उससे ऐसा आभास होता है कि सुझावों पर दोनों पक्ष एकमत हैं। दोनों ओर के लोगों को अब तक हुई प्रगति की जानकारी होनी ही चाहिए। अंततोगत्वा वे ही तो महत्वपूर्ण हैं। परिदृश्य के पीछे वार्ता एक बिंदु तक होना ही सही है, परंतु एक लोकतांत्रिक ढांचे में लोग ही तो शासक हैं और उन्हें सुनिश्चित तौर पर समझौते का ब्यौरा पता होना ही चाहिए। दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों के बीच जो समस्या व्यवधान सा उपस्थित करती है वह यह है कि इस्लामाबाद ने सारे अंडे कश्मीर की टोकरी में ही रख दिए है। जब तक उसका समाधान उसके संतोष के अनुरूप नहीं हो जाता तब तक व्यापार और व्यक्ति से व्यक्ति संबंधों में सुगमता के लिए वीजा में सरलता की दृष्टि से कोई प्रगति नहीं हो सकती। ़मेरा विश्वास है कि इन दो मुद्दों के क्रियान्वयन से दोनों देशों के लोगों में निकटता बढ़ सकती है और एक-दूसरे के विरुद्ध अविश्वास के पर्दे हट सकते हैं। मेरे विचार में निरूपमा राव ने व्यापार की फिर से बहाली का प्रस्ताव किया होगा। इससे एक से दूसरे देश में समृद्धि के लिहाज से निहित स्वार्थ सृजित होंगे। मैं यह भी कामना करता हूं कि उन्होंने सर क्रीक और सियाचिन ग्लेशियर पर दो समझौतों पर हस्ताक्षर की पेशकश की ही होगी। एक समय पर जुल्फिकार अली भुट्टो ने कदम-दर कदम उस राह का समर्थन किया था जो भारत अपनाने को था, किंतु अब तीन दशकों का विलंब हो चुका है। तब वह समग्र समाधान चाहते थे, जिसके पाकिस्तान अब पक्ष में है। वार्ता और विचार-विमर्श से ही मतभेद पाटे जा सकते हैं। निरूपमा राव ने चेताया है कि अगले कुछ माह के लिए चीजें शिथिल रहने वाली नहीं हैं। खासी सक्रियता रहेगी। उससे इस जानकारी की पुष्टि होती है कि दोनों देशों के गृह सचिव विदेश मंत्रियों की बैठक होने से पूर्व मिलेंगे। निरूपमा राव ने कहा है कि प्रक्रिया शुरू करने की इच्छा है। दोनों पक्ष शिष्टाचार की विधि के सिद्धांत के अनुसार कार्य करने पर सहमत हो गए। कानूनी शिष्टाचार पारस्परिक संबंधों का नया द्वार खोलता है। इससे तात्पर्य यह है कि अदालतें इस ढंग से काम न करें जिससे दूसरे देश के क्षेत्राधिकार, कानूनों अथवा न्यायिक निर्णयों पर किसी भी तरह से बुरा प्रभाव नहीं पड़े। मात्र सरकार के स्तर पर ही बात का क्रम न चले, बल्कि बौद्धिक वर्ग, व्यापारी, विधिज्ञ, डाक्टर, पत्रकार और सिविल सोसाइटी के अन्य सदस्यों के स्तर पर भी ऐसा होना अत्यावश्यक है। दोनों पक्षों को एक लंबे प्रयास के लिए तैयार होना चाहिए। उतार-चढ़ाव को झेलने की सिद्धता भी चाहिए। उन लोगों द्वारा आघात लगाने के प्रयास होंगे जो मैत्रीपूर्ण संबंध नहीं चाहते। उन कट्टरपंथियों की ओर से भी धमकियां मिलेंगी जो प्रयासों को सांप्रदायिक रंग देना चाहेंगे। इनका मुकाबला करने के लिए दोनों देशों को संबंधों को सामान्य बनाने की प्रतिबद्धता और संकल्प दर्शाना होगा। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
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