यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) और भारत सरकार के बीच 10 फरवरी से शुरू होने वाली बिना शर्त बातचीत का श्रेय बांग्लादेश को दिया जाना चाहिए। शेख हसीना ने बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बनते ही कहा था कि वह अपने देश की धरती से भारत विरोधी गतिविधियां चलाने की इजाजत किसी उग्रवादी गुट को नहीं देंगी। हसीना ने जो कहा, उसे करके दिखाया और स्वयं को भारत का वास्तविक मित्र साबित किया। वैसे, उल्फा द्वारा भारत सरकार के साथ बिना शर्त वार्ता शुरू करने को सशस्त्र आंदोलन छोड़ने के विवेक के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उल्फा ने पांच फरवरी को कहा कि दस फरवरी को शुरू हो रही बातचीत में असम की संप्रभुता को शामिल करने की शर्त वह नहीं रख रहा है। यह बयान इसलिए सार्थक है क्योंकि स्वाधीनता के तुरंत बाद ही पूर्वोत्तर के उग्रवाद से भारत की संप्रभुता को चुनौती मिलने लगी थी। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि भारत की विविधता, विशालता और बहुलता से सामंजस्य नहीं बिठा पाने के कारण ही पूर्वोत्तर में संप्रभुता की मांग ने जोर पकड़ा था। असम की संप्रभुता की मांग को हासिल करने के लिए ही परेश बरुआ ने 1979 में उल्फा की स्थापना की थी। उल्फा ने भारत के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर रखी थी। उल्फा ने लंबे समय तक आल त्रिपुरा टाइगर्स फोर्स (एटीटीएफ), मणिपुर पीपल्स लिबरेशन फ्रंट (एमपीएलएफ), यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) और रिवोल्यूशनरी पीपल्स फ्रंट (आरपीएफ) के साथ मिलकर असम, त्रिपुरा और मणिपुर में ऑपरेशन फ्रीडम चलाया। तथ्य यह भी है कि असम समेत पूरे पूर्वोत्तर में उग्रवादियों की हिंसा का सामना करने के लिए सरकार स्वयं हिंसा का सहारा लेती रही है। अकेले असम में उल्फा व सुरक्षा बलों के बीच हुए हिंसक संघषरें में अब तक दस हजार लोग मारे गए हैं। ये मौतें रोकी जा सकती थीं। क्या यह सच नहीं कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व के पास कोई दूरगामी कार्यनीति नहीं होने के कारण ही पूर्वोत्तर में उग्रवाद फलता-फूलता गया और शासन के हाथ से हालात निकलते चले गए? इसलिए उल्फा से वार्ता शुरू करने के अवसर का उपयोग भारत सरकार को ऐसी दूरगामी रणनीति बनाने में करना चाहिए जो समूचे पूर्वोत्तर के उग्रवाद व असंतोष को दूर करने में सहायक हो। सरकारी वार्ताकारों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि संवेदनशील सोच नहीं रखने के कारण ही शासन आज तक पूर्वोत्तर के उग्रवाद की समस्या का हल नहीं ढूंढ़ पाया है। सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि पूर्वोत्तर में विकास न होने और रोजगार के अवसरों की कमी के कारण ही वहां नौजवानों में असंतोष बढ़ता रहा है। सरकार को पूर्वोत्तर के लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर कार्यनीति बनानी होगी। स्थानीय योजनाएं बनाकर खेती, कुटीर उद्योग के साधन मुहैया कराए जाने चाहिए, प्रकृति से छेड़छाड़ बंद होनी चाहिए और पूर्वोत्तर की जनजातियों की भाषाओं को मान्यता दी जानी चाहिए। आखिर आज तक पूर्वोत्तर की भाषाओं के आत्म गौरव व पहचान को सरकारी स्तर पर स्वीकृति क्यों नहीं दी गई है? मेघालय की खासी और गारो, अरुणाचल की निशी, त्रिपुरा की काकबराक, चकमा और मणिपुर की मीतै जैसी समृद्ध भाषाओं को पूर्वोत्तर में शिक्षा का माध्यम क्यों नहीं बनाया गया? इन भाषाओं के साहित्य को हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में लाने की दिशा में सरकारी संस्थाओं ने क्यों रुचि नहीं दिखाई? पूर्वोत्तर की एक अन्य समृद्ध भाषा है-बोडो। बोडोभाषियों ने सत्तर के दशक में अलग बोडोलैंड की मांग को लेकर जोरदार आंदोलन किया था जिसमें सैकड़ों युवक हताहत हुए थे, हजारों को जेल हुई थी और अंतत: बोडो भाषा को सरकारी मान्यता मिलने व बोडो स्वायत्त परिषद बनने के बाद ही वह आंदोलन वापस हुआ था। दस फरवरी की वार्ता में हिस्सा ले रहे भारत सरकार के प्रतिनिधियों को यह भी देखना चाहिए कि पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को लागू करने की नीति क्या सम्यक रही है? सुरक्षा के लिए इस कानून को लागू किया गया है पर इस कानून ने वहां की जनता को और ज्यादा असुरक्षित, लाचार व भयभीत बनाया है। इस कानून को वापस लेने की मांग को लेकर मणिपुर की इरोम शर्मिला सत्याग्रह के रास्ते को अपनाते हुए नवंबर 2000 से अनशन कर रही हैं। सरकार इस तरह के अहिंसक आंदोलनों के प्रति भी असहिष्णुता क्यों दिखा रही है? इरोम ने अपनी एक कविता में लिखा है-मैं तो शांति की सुगंध फैलाऊंगी/ अपने जन्मस्थल खाग्लेई से/ आने वाले युगों में/ यह सारी दुनिया में फैल जाएगी। उल्फा पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा उग्रवादी गुट रहा है। उसके रुख में बदलाव का असर पूरे पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों पर पड़ेगा। निश्चित ही यह एक शुभ संकेत है। उल्फा के रूपांतरण के बाद अब भारत सरकार की बारी है। सरकार को अपनी मौजूदा नीतियों को टटोलना चाहिए और उग्रवादियों की मांगों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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