Tuesday, February 15, 2011

अब भी समाधान से दूर नेपाल


जनवरी 2007 में माओवादियों ने जब 10 वर्षों की अराजकता के बाद कुछ लोकतंत्र समर्थकों के साथ मिलकर नेपाल की राजशाही को खत्म कर वहां लोकतंत्र की स्थापना में सफलता पाई थी, तो इसे नई सुबह के रूप में देखा गया था। पर लगता है कि नेपाल अब तक सुबह से पहले के कुहासे को चीरकर बाहर नहीं आ पाया है। सवाल उठता है कि क्या नेपाल की तंग राजनीति लोकतंत्र को गंतव्य तक पहुंचने देगी।
लंबी राजनीतिक उठा-पटक के बाद जब नेपाली संसद ने झलनाथ खनाल को प्रधानमंत्री चुना, तो त्वरित प्रतिक्रिया आई कि अब पिछले सात महीनों से जारी राजनीतिक संकट समाप्त हो जाएगा। लेकिन लगता है यह आकलन गलत सिद्ध होगा। क्योंकि माओवादी नेता ने जो देश के लिए तथाकथित त्याग किया था, वह दरअसल त्याग नहीं, बल्कि परदे के पीछे की गई एक सौदेबाजी थी। इसका अभी तक पूरी तरह से खुलासा तो नहीं हो पाया है, पर खबर है कि खनाल-प्रचंड सौदेबाजी के मुताबिक, खनाल 24 मई को अपना पद प्रचंड के लिए छोड़ देंगे। नेपाल के एक वित्तीय अखबार आर्थिक अभियान की रिपोर्ट में कहा गया है कि खनाल और माओवादी प्रमुख प्रचंड, दोनों इस बात को महसूस करते हैं कि वे 28 मई तक नया संविधान तैयार नहीं कर पाएंगे। लिहाजा खनाल 24 मई को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे और उसके बाद कम्युनिस्टों के समर्थन से प्रचंड नए प्रधानमंत्री बनाए जाएंगे।
अखबार की इस खबर पर भरोसा करें, तो कहना गलत न होगा कि खनाल माओवादियों के सत्ता तक पहुंचने का साधन हैं। सात महीनों तक चली उठा-पटक से साबित हो गया कि माओवादी सीधे रास्ते सत्ता तक नहीं पहुंच पाएंगे। इसलिए प्रचंड ने यह रास्ता खोज निकाला। इस रिपोर्ट के अनुसार खनाल ने अपनी ही पार्टी को अंधेरे में रखकर माओवादियों के साथ सात सूत्री समझौता किया। स्थायी समिति की बैठक में खनाल ने स्वीकार भी किया कि सत्ता की साझेदारी और पूर्व लड़ाकों के सेना में एकीकरण समेत प्रमुख मुद्दों पर उनका प्रचंड से गुप्त समझौता हुआ है। मतलब यह समझौता देश की चुनौतियों से निपटने के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हुआ है। लेकिन क्या यह उद्देश्य पूरा हो पाएगा?
इस सौदेबाजी के बाद भी खनाल को कैबिनेट चुनने में छीकें आ गईं, क्योंकि दोनों दल सत्ता बंटवारे को लेकर किसी समझौते पर पहुंचने में विफल रहे। सूत्रों के मुताबिक, खनाल की पार्टी पूर्व विद्रोहियों को गृह तथा रक्षा विभाग देने को राजी नहीं थी। नतीजतन माओवादियों ने सरकार में शामिल होने से ही इनकार कर दिया। हालांकि माओवादी नेता ने यह आश्वासन दिया कि वह नई सरकार को बाहर से समर्थन देते रहेंगे। लेकिन कब तक?
खनाल सरकार के समक्ष दो अहम चुनौतियां हैं। पहला, 28 मई तक संविधान को पूरा करना और दूसरा, मध्य फरवरी तक संसद से चालू वित्त वर्ष के बजट का अनुमोदन कराना। यदि सरकार बजट का अनुमोदन कराने में विफल रही, तो देश वित्तीय संकट में फंस जाएगा। लेकिन इससे भी गंभीर बात है, नेपाल की आधारभूत जटिल स्थिति। उल्लेखनीय है कि माओवादी आंदोलन ने नेपालियों को गरीबी में धकेलने में खासी मदद की। आज लगभग एक करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, 70 प्रतिशत आबादी निरक्षर है, 1.8 करोड़ लोगों के पास बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं और 24.4 प्रतिशत परिवार भूमिहीन हैं। वहां बाल मजूदरों की संख्या 26 लाख के आसपास है और लगभग दो लाख से भी ज्यादा महिलाएं वेश्यावृत्ति के लिए विवश हैं। औद्योगिक विकास न के बराबर है और 81 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। अधिकांश नेपाली रोजगार की तलाश में भारत और खाड़ी देशों सहित पूर्वी एशिया का चक्कर काटते हैं। इनसे निपटने के लिए राजनीतिक दलों के पास न तो कोई आर्थिक मॉडल है और न ही इच्छाशक्ति।
फिलहाल खनाल पूरी तरह से माओवादी सांसदों पर आश्रित हैं, इसलिए उनसे जनता के भले की उम्मीद करना बेमानी होगा। पर क्या नेपाली नेताओं को दुनिया के जन उभार दिखाई नहीं देते। इससे पहले कि जनता में रोष उत्पन्न हो, वहां के राजनेताओं को अपनी आंखें खोल लेनी चाहिए। भारत को भी इन गतिविधियों पर नजर रखनी होगी, क्योंकि माओवादी चीन को नेपाल में सक्रिय करने के लिए इसका फायदा उठाना चाहेंगे, ताकि भारत को काउंटर बैलेंस किया जा सके।

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